Sunday, September 22, 2013

जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा

एक स्वप्न सुनेहरा सजाएँ तो,
हम सब गर्वित रह पाएँ तो,
इसके लिए मान ले मेरी एक अर्ज़ी
उठा अपनी सोई खुदगर्ज़ी।
तू सबसे प्यार पायेगा
और जग में प्रेम लुटायेगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।

इस भागती हुई दुनिया में खुद को ढूंढ ला।
ज़रा रुक, ज़रा ठहर, ज़रा संभल जा।
एक बार पीछे मुड़कर देख तो सही ,
औरों के लिए तूने खुद को खो दिया कहीं।
तब भी हर कोई तुझसे मिलना चाहेगा
पर सबसे मिलकर तू खुद को पा जाएगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।

करेगा हर काम जब तू सही ढंग से ,
क्योंकि देख रहा होगा खुद को अपने ही मन से ,
उभर पायेगा तू दुनिया के मोह से ,
नहीं ललचायेंगे तेरेको कागज़ के टुकड़े।
तू रिश्वत की कमाई ठुकरयगा
और अपने आप से नज़रे मिला पायेगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।

कदर करेगा उसकी जो है तेरे पास ,
आम सी चीज़ भी तेरी होगी तेरे लिए खास।
लुफ़्त उठाएगा अपने साथ बिताये हर पल में,
निद्रा होगी गहरी तेरी कल में।
तुझको तेरी भाषा, संस्कृति और देश भायेगा ,
विश्व भ्रमण के बाद भी तू भारत लौट आएगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।

नहीं उतर पायेगा तू किसी के सीने में गोली ,
लहू बहाकर किसी का नहीं भर पायेगा अपनी झोली।
निकल पाएंगी अब वो भी घर से ,
जो अब तक थी चारदीवारी में सहमी हुई डर से
क्योंकि तू उन्हें सुरक्षित एहसास करवाएगा ,
पुरे विश्व में विश्वासपात्र बन जाएगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।

बात नहीं ये झूठे आत्म्सम्मानियों की ,
जिन्होंने इर्षा, अहं और लालच को आत्मसम्मान की आड़ दी
और जो स्वयं को शीर्ष पर रखने की खातिर
हो गए शीश काटने में माहिर।
ऐसा व्यक्ति तुझसे धुत्कार पायेगा ,
तू दूसरों की इज्ज़त का भी सम्मान कर पायेगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।

होगा सम्पूर्ण स्वप्न साकार तभी ,
जब मिलकर कदम उठायें सभी।
है मुश्किल पर नही नामुमकीन ,
और मुझे तुझ पर है पूरा यकीन
की इक दिन तू गर्व से रह पायेगा ,
मुड़कर इन दिनों को याद नहीं करना चाहेगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा। 

Sunday, September 1, 2013

अंतिम कथन

                                        अंतिम कथन


खुश 
नहीं हूँ आज मैं , खो गया मेरा वो सबकुछ 
संभाले रखा था वर्षों से संजोकर 
जो कुछ अपने भीतर। 
खुश नहीं हूँ आज मैं , छीन गया मेरा वो सबकुछ 
जो भी था मेरा था ,
मेरा अधिकार , मेरा सम्मान , मेरे सपने 
बस यही था मेरे पास 
जोकि आज मेरा नहीं। । 

ज़रा सोचा भी नहीं था तूने 
उस वक़्त ,
जब लूट रहा था मुझे 
कि मैं क्या हूँ ? मैं कौन हूँ ?
काम क्या है मेरा और मेरे सपने ?
ज़रा देखा भी नहीं था तूने
मेरे दर्द को 
जो चीख - चीख कर मेरी जुबां , कर रही थी बयां 
और मेरी आँखे ,
अब जो नहीं  है 
इस दुनिया को देखने की इच्छुक 
क्योंकि देख ली है मैंने दुनिया 
कि होती है कितनी सुन्दर और कितनी अच्छी 
और देखा है मैंने इसका वो रूप भी 
जो काश !
कोई ना देखे 
पर सोचें सभी 
मेरे दर्द को , मेरे इस  कष्ट को। 

क्या लौटा सकता है उसे जो छीन गया है मेरा ?
क्या है कोई जो दे सकता है मेरा सबकुछ वापस ?
नहीं-नहीं , नहीं-नहीं 
मुझे पता है इस बात का 
भलीभांति। 

खूब देख ली मैंने ये ज़िंदगी और ये सपने 
अब और चाह नहीं कि देख लिया मैंने वो भी जिसके कारण  
अब खुश हूँ मैं 
कि मैंने देखा इस दुनिया का वो रूप भी जो था 
सबसे भयावह , सबसे डरावना , सबसे भयंकर। 

ये ख़ुशी है कि अब सही नहीं जाती 
ये आंसू हैं , कि थामे नहीं जाते  
ये जुबां भी और स्वर भी 
नहीं देते साथ मेरा 
और अब न ये कलम।

---गुंजन बेलवंशी 















Saturday, August 24, 2013

कोमनवेल्थ गेम्स तेरा क्या कहना।

दिल्ली को मिला सौभाग्य
देश में कोमनवेल्थ का रहना
कोमनवेल्थ गेम्स तेरा क्या कहना।

खुशियाँ सभी ने मनाई
मशाल जब दिल्ली में आई
तैयारियाँ की जोर शोर पर
होने लगी सफाई घर घर
दिखावे की चादर को पहना
कोमनवेल्थ गेम्स तेरा क्या कहना।

बदलती रही अंतिम तारीख
कभी नहीं आई करीब
काम पूर होगा कैसे
धीमी गति से चल रहा था जैसे
बार बार स्टेडियम का ढेहना
कोमनवेल्थ गेम्स तेरा क्या कहना।

होने लगा कोमनवेल्थ का प्रचार
देश को सुरक्षित करने की गुहार
लोगो पर भी चढ़ गया बुखार
देखने गए खेलगाँव बार बार
ए आर रहमान ने निकल गाना
कोमनवेल्थ गेम्स तेरा क्या कहना।

'ब्लू लेन' ने किया ट्रैफिक खड़ा
जगह जगह पानी भरा
करोड़ो रूपए का हुआ खर्चा
पर भला ना हुआ आम आदमी का
आम आदमी का था सहना
कोमनवेल्थ गेम्स तेरा क्या कहना।

Friday, August 23, 2013

जीवन की क्षण-भंगुरता

शीर्षक          : जीवन की क्षण-भंगुरता 

छंद              : रुचिरा (मात्रिक)

छंद-संरचना :१६,१४ 

                      १६,१४ 

                      अंत में एक गुरू।  


पवन जगाता अलख नज़ारे , चमक  दामिनी अम्बर में।
खलबल खलबल सिन्धु हो रहा ,प्राण काल  के है कर में।
नीर-समीर  मिले   तब  ऐसे , बरसों  बिछड़े  यार  मिले।
क्रुद्ध  धुंध  की  आतुर  बाहें , जीव  अजीव  अलिंगन  ले।
निर्दय दानव सिन्धु हो रहा ,निगलन लगा जलयान को।
अब  तक  समझ नही पाया रे ,प्रभु  के विप्लव-गान को।
चटख  सुंदरी  माधव  गढ़ की ,बन  के  मॉडल   दंभ करे।
विलय  हो  रही  जल में काया , रक्त  उदधि  में रंग भरे।
अतिवादी!  आतंक  तुम्हारा , था  तुच्छ  इस आतंक से।
सता  रही  तुझको  भी  दहशत , तू  डर रहा इस जंग से।
रे व्यापारी!  कित   गया  दंभ ?  हो  रहा सौदा जान का।
बलवंत  सागर  ठग  रहा  है , इह  माल सब व्यापार का।
एक  गत  सब की  है हो गई , महज वेश्या ; या छात्र हो।
जीवन  क्षण-भंगुर है'परमा' ,ज्यों कांच का इक पात्र हो। 

                                                                                                     --परमानंद 

Thursday, August 22, 2013

कुछ बाते

कुछ बाते
हमें कुछ बता जाती है
पर हम सुन नहीं पाते।

कुछ बाते
हमें बहुत कुछ दिखा जाती है
पर हम देख नहीं पाते।

कुछ बाते
बहुत गहरी होती है
पर हम उनकी गहराई समझ नहीं पाते।

होता है ऐसा , कि ज़िन्दगी
मौका तो देती है सुनने का
लेकिन सुनकर भी हम अनसुना है कर जाते
क्योंकि होती तो है वो कुछ बाते।

कुछ बाते रिश्ते तोड़ सकती है, जोड़ सकती है,
ज़िन्दगी का रिख कुछ इस कदर मोड़ सकती है
कि वो पल, फिर दोबारा नज़र नहीं आते
और होती है ये वही कुछ बाते।

छोटी छोटी बातों पर लोग हो जाते है नाराज़ ,
छोटी छोटी बातों पर हो जाता कत्लेआम ,
लेकिन फिर भी हम उन्हें नज़रंदाज़ है कर जाते
क्योंकि होती तो है वो कुछ बाते।

काश, हमने उन्हें सुन लिया होता
तो ये दिल यूं नहीं रोता
और हम इस कदर न पछताते
अगर समझ जाते, वो कुछ बाते। 

Wednesday, August 21, 2013

मृत्यु प्रमाण पत्र

एक दिन अपने समक्ष, दो मुच्छड पहलवानों को देख मै डर गया।
वे बोले "हम यमदूत है", मै समझ गया कि मै मर गया।।

उन्होंने कहा "अपना मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाओ,आगे के लिए ज़रूरी है।
मैंने कहा "कहाँ से बनवाऊँ,मेरे घर में सिर्फ माँ बूड़ी है।।

वे बोले "कोई नी, हज़ार की पत्ती दो अभी बनवा देंगे।"
जेब टटोलने पर जब कुछ ना निकला , तो उन्होंने दिखाए ठेंगे।।

और कहा "जब हो जाये तुम्हारा काम तो  'मिस्काल' करना।
मुझे क्या पता था, हज़ार की कमी के लिए , दो हफ्ते धरती पर था सड़ना।।

अगले दो हफ़्तों में, मै जान गया भटकती आत्माओं का राज़।
अरे , उन्हें तो है सिर्फ एक 'डेथ सर्टिफिकेट ' की दरखास्त।।

यमदूतों ने मेरे मृत्यु प्रमाण पत्र की आँखों ही आँखों में 'फोटोकॉपी' कराइ।
और उसे एक कागज़ पे छाप के मेरे हाथों में थमाई।।

ले गए वो मुझे जीवन निरक्षक के पास।
जिसने मुझे मेरे जीवन के आधार पर , दिए दस में से साढ़े सात।।

मुझसे उसने पुछा कि "कारण सहित बताये स्वर्ग जायेंगे या नर्क ?"
मैंने कहा " जाना  तो मई पक्का चाहूँगा स्वर्ग, पर इसका अब मै क्या दूँ तर्क।"

उसने मुझे थोड़ी देर प्रतीक्षा करने को कहा।
जैसे ही होगी कोई सीट खली, आपको जायेगा बुलाया।।

तभी मैंने दस में से पाँच लिए व्यक्ति को स्वर्ग जाते देखा।
और अपने यमदूत की तरफ प्रश्नों से भरा चेहरा फेंका।।

यमदूत बोला "तुम्हारा मुख क्यों एक प्रश्न है।
इसके साथ तो आरक्षण है।।"

आखिर मेरे मृत्यु प्रमाण पत्र पर भी स्वर्ग का ठप्पा लगा।
और मै अपने दोनों यमदूतों की बड़ी सी बैल पे स्वर्ग की ओर भगा।।

स्वर्ग की खूबसूरती को मै कैसे बयान करूँ ?
ऐसा लगा 'श्वेत' लोगों के बीच 'श्वेत' धरती पर हूँ।।

वहाँ मुझे, मुझसे पांच माह पूर्व बिछड़ा घनिष्ठ मित्र मिला।
किसी जान पहचान वाले को अपने पास देखकर, मेरा भी चेहरा खिला।।

उसने मुझे कहा "जल्दी से पंक्ति में आ जाओ ,
कहीं कायदे  तोड़ते पकडे ना जाओ।।

कायदे तोड़ते पकडे गए तो मिलेगी भयंकर सज़ा। "
मैं बोल "मैंने तो सोचा था स्वर्ग में आता है मज़ा।।"

वो बोला " ये सब झूठ है,मिथ्या है,यहाँ तो सभी क्रूर है।
मत पूछ  भाई ,यहाँ तानाशाही भरपूर है।।"

मैंने आश्चर्य में पुछा, "तो ये क्यों कर रहे है नृत्य ?"
वो बोला "ये तो करेंगे ही, क्योंकि ये नहीं है मृत।।

अपने जुगाड़ से इन्होने नकली मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाये है।
रात भर यहाँ मौज करके वापस अपने शारीर में लौट जाये है।।"

उसके चेहरे पे आती एक अद्भुत मुस्कराहट का कारन पूछा।
वो बोला "इसका भी है पहलु दूजा।।

वो देख वो जो वहाँ मुह लटकाए खड़े है।
वो भी इन्ही के बिरादरी के जुगाडू बहुत बड़े है।।

पर इनसे शरीर में पहुंचने में हो गयी थोड़ी सी देर।
और उनका शारीर आग में जलकल हूँ गया ढेर।।

अब ये भी यहीं फंस गए है।
और हमारे साथ सब कुछ सहे है।।"

वह बोला "कभी-कभी सोचता हूँ, काश चुन लिया होता नर्क।
कम से कम ना मिलता ऐसा अनपेक्षित स्वर्ग।।"

मैंने सोचा क्यों आम आदमी गलत चुनाव करता है ?
शायद इसलिए, क्योंकि वो जो भी चुने,रोना उसे ही पड़ता है।।

Monday, August 19, 2013

कविता

एक बार शीशे में उतार के तो देखो।
दिल के विचारो को उभार के तो देखो।।

कभी ख़ुशी, कभी गम 
कभी दिल की धकधक नज़र आएगी। 
कभी माफ़ी ,कभी प्रहार
आँखों की चमक नज़र आएगी। 
कभी गुस्सा, कभी डर 
अपनी महक नज़र आएगी। 

एक बार शीशे में उतार के तो देखो।
दिल के विचारो को उभार के तो देखो।।

कभी मोहब्बत की दास्ताँ 
कभी नफरत की कहानी की रूपक नज़र आएगी। 
उस वक़्त उमड़े एहसासों की 
एक झलक नज़र आएगी। 
कभी उल्लास कभी दुःख में हुई नम 
आँख की वो पलक नज़र आएगी। 

एक बार शीशे में उतार के तो देखो।
दिल के विचारो को उभार के तो देखो।।

कभी अच्छाइयों के लिए बजाती तालियाँ 
कभी बुराइयों की दबाती हलक नज़र आएगी। 
कभी प्रशंसा कभी धुत्कार 
कभी फटकार कड़क नज़र आएगी। 
पुराणी कुरीतियों के ख़राब बीजों से दूर 
नयी पीड़ी की, नयी रीत की, नयी कनक नज़र आएगी। 

एक बार शीशे में उतार के तो देखो।
दिल के विचारो को उभार के तो देखो।।

Sunday, August 11, 2013

"एक गाथा ऐसी भी"

मुझे फिराया बहुत दिनों तक ,

नहीं लगती थी हाथ । 

मुझसे एक नहीं फसती थी ,

औरों से फंस जात ।

 चंचल थी जल की भांति '

छनकीली सी देह । 

आज फसी है जाल में ,

अब नाही संदेह । 

ले चला में उसे चने के खेत में ,

जहां लगाईं घात । 

उज्जवल गाथा सुनो वहा की ,

मधुर चांदनी रात ।

ऐसा आज मसलू इसको ,

दिल की आग बुझाय ।

मखमल सी उस मेढ़ पे ,

इसे पटक दूँ जाय । 

पिंजरा खोला जाय खेत पर ,

इक दंभ भरे अहसास में ।

 दै भागी वो चुहिया ,

गुम  हो गई उस घास में ।

 बाल नोंचू माथा ठोकूं ,

उस दिन पछताया खेत पे । 

' परमानन्द ' बहुत खीजा फिर ,

चुहिया से चेक-मेट पे । 

"नवोदय-होली"

जब-जब गूंजे इन कानों में ; होली के किलकारे ।

तब-तब जी उठते यादों के ; सुन्दर से गलियारे ।

उत्साहित हो बाहर आ जाते ; कर के झटपट नेत्र-निमीलन ।

सारे साथी खड़े ग्राउंड में ; हैप्पी होली रंग मिलन ।

चुपचाप खड़े हो मेस देखता ; नवोदय की होली-लीला ।

पांच सैकड़े लोग इकट्ठे ; तिस पर डी जे भड भड़कीला ।

अनंत ख़ुशी खिल उठी रंग की ; चंद झडकियों पर ही ।

मौक़ा पाकर अजमा लेते ; कुछ रंग लड़कियों पर भी ।

रंग-गुलाल से भूत बने ; कछु मंच पे नाच लगे करने ।

कछु दौड़े कछु पीछू धावै ; सबकी जेब लगे हरने ।

' जेब-फाड़ आन्दोलन ' भैया ; न कौनो की जेब बचे ।

फिर पकर धरें गड्ढे माहीं ; कीचड़ से सुन्दर देह रचे ।

कछु 'स्कूल बिल्डिंग' को दौड़ पड़े ; कछु जंगल की गैल धरी।

साथ से सत्तर लगे ढुढैय्या ;मिल जाबे तो खैर नहीं ।

                   गिरत पडत जात ।

                   भागत भगत जात ।

                   देखत न आन-ताव ;

                   शूलहु चुभत जात । 

                   ढूंढ़त खुर्राए बांकी ;

                   पंक से आपंक भये । 

                   पंक के खिलाड़ियन की ;

                   टीम अब बढ़त जात ।

याद है वो  दहन होलिका ; जी भर नाचे खोये से । 

"कल छूट जायेगी स्वर्ग-धरा ये " ; फूट-फूट कर रोये थे ।

बता हठीले भाग्य हमारे ; फिर कब वो होली आएगी ?

जब एक साथ मिल प्रेम गगन में ; रंग घटा घेरायेगी । 

मानसरोवर सुध-सरोज ; धरो मधुकोष सुटारो । 

'परमानन्द'भयो आनंद ; यो चख मकरंद को स्वाद निरालो । 

                                                                         --Parmanand

काव्या

शीर्षक:-           काव्या 

छंद:-               रुचिरा (मात्रिक)

छंद-संरचना :-   १६,१४ 

                       १६,१४

                        अंत में एक गुरु |  

मैं बैठा था हरी मेढ़ पर, हरि की महिमा मन में थी। 

झूम रही गेहू की बाले ,हवा नाचती तन पे थी। 


पास कहीं चिडियों की चै-चै ,काक-भगोड़े की चुप्पी।

 दबे पाँव आ हवा बसंती ,देती जादू की झप्पी। 


तभी अचानक पलास-पत्र से ,सुरमुर की आवाज उठी। 

चौंक पेड़ को देखा मैंने ,इक सिहरन सी जाग उठी। 


कुछ श्वेत पात के पीछे ,देखा हलकी सी गति में।

जिजीविषा में कदम बढ़ाया ,बन संदेह पड़ा मति में। 


धीरे धीरे भ्रम का पर्दा ,उठा आँख के ऊपर से।

श्वेताम्बर में सुन्दरता सी ,प्रकट भई उस झुरमुट से। 


कुछ क्षण तक मैं रहा देखते ,कुदरत ज्यो देखा करता। 

मन-मंदिर का मेरा मोहन राधा के दर्शन करता।


 श्वेत फ्रॉक में मन ही मन में ,कल्पित थी कब से परियां। 

दिव्य रूप ले आज खिल उठी ,पुष्पराज की पंखुड़ियाँ।



अमीय-सरिता सी वाणी से ,पानी शब्द झरा झर  से |

गन्धर्व-लोक में खोइ गया ,भीगा-सा अमृत-रस से। 



"प्यास लगी है हमें जोर से ,क्या कुछ पानी यहाँ मिले?

चला पम्प दो हमें ज़रा-सा ,ठडक उतरे शुष्क गले।"


 स्तब्ध मौन हो उसे देखता ,आगे को दो कदम रखे।  

फिर चुपचाप कूप तक पंहुचा ,बटन दबाया पंप चले। 


पलास पत्र से झटपट मैंने ,एक कटोरी सुगढ़ रची। 

दिया स्वच्छ जल उसमे भर कर ,जिससे उसकी प्यास बुझी।


 पानी पीकर चुप्प चाप से ,चल दी अपनी वही गली। 

अपलक हो मैं रहा देखता ,परी लोक की वह तितली। 


देखत-देखत हो गयी ओझल ,क्षितिज बिंदु में समां गयी।  

रजत रूप की निर्मल ठंडक , मेरी आँखे जमा गयी। 

                                                           - "परमानन्द "

समग्रता



इस जगत के इतिहास एवं प्रकृति की साक्ष्यता के आधार पर,  मनुष्य ही विकास का पर्याय बन चूका है। ये  विकास एक ही दिशा में भी हो सकता है और बहुगामी भी, आंशिक भी हो सकता है और पूर्ण भी, धर्म के अनुरूप भी हो सकता है और प्रतिकूल भी।
आत्मा व् बुद्धि, दोनों ही मनुष्य के व्यवहार के आधर पर ही विकसित होते हैं। यद्यपि आत्मा का पूर्ण विकास असंभव है पर अपनी चिंतन शक्ति के बल पर प्राणी अपनी बुद्धि को एक केन्द्रित विषय के लिए मजबूत कर सकता है, जिसे समग्रता कहा जाता है।

समग्रता धर्म-अधर्म, सत्य या असत्य पर निर्भर नहीं होती। ये तो केवल तटस्थ रूप में प्रबलता की द्योतक है, एक ही निर्धारित, विषय के लिए, चाहे उस विषय की प्रकृति कुछ भी हो। यद्यपि समग्रता को बहुगामी तो नहीं कहा जा सकता किन्तु एक विषय से सम्बंधित सभी पहलुओं में सामर्थ्य विकसित करने लिए ये बहुगामी भी हो सकती है।            
विषय में निहित तथ्यों के विश्लेषण की पुनरावृति में ही, समग्रता का मूल भाव विक्षिप्त है। अतः अभ्यास ही समग्रता की नींव है। तथ्यों के अन्वेषण के पश्चात् उन पर मनन करना ही अभ्यास की प्रकृति होनी चाहिए। इस सम्पूर्ण अभियान की ताकत है सशक्त सम्प्रेषण। 
सम्प्रेषण न केवल प्राणी की मानसिकता का परिचायक है वरन ये तो विषय के अभ्यास एवं विश्लेषण का भी प्रबल माध्यम है । समग्रता की और अग्रसर मनुष्य को अपने मानसिक व्यक्तित्व के हर उस पहलू की बारीकी से परखना होता है जो की निर्धारित विषय से सम्बंधित है ।  विकास का सर्वश्रेष्ठ साक्ष्य, सम्प्रेषण ही उपलब्ध करा सकता है ।
 स्वयं के सामर्थ्य की अनुभूति  या तो सशक्त सम्प्रेषण से होता है अथवा फिर स्थिर मौन भाव से ।  यद्यपि दोनों ही तत्त्व प्रकृति में एक-दुसरे से विपरीत है किन्तु अपने अपने क्षेत्र के आधार पर इनका परिणाम एक ही होता है, अनुभूति ।बुद्धि के सामर्थ्य की अनुभूति सम्प्रेषण में होती है, वही आत्मा के सामर्थ्य की अनुभूति मौन से ही निश्चित की जाती है ।
अतः सम्प्रेषण के माध्यम के बिना प्राणी अभ्यास और विश्लेषण  में कमी दक्ष नही हो पायेगा और वहीँ अच्छे सम्प्रेषण के लिए निरंतर अभ्यास भी आवश्यक है।
यदि आत्मा सकारात्मक रूप में मष्तिष्क पर नियंत्रण रखती है तो भी विचार तो सुदृढ़ हो जयेंगे किन्तु समग्रता केवल सम्प्रेषण की शक्ति से ही संभव है और सम्प्रेषण केवल अभ्यास से। अतः समग्रता का मूल कारक अभ्यास ही है। 

                                                                                                                      'हिन्द' 


Saturday, August 10, 2013

गीत टूटे हुए...

इक शर्त थी इलाही तेरी, वही बेशर्त निभा रहा हूँ
छलनी है सीना मगर, मैं गीत गा रहा हूँ
वादा था बन्दे से तेरे, या जिद थी कभी न गाने की.. अब याद नहीं
जुबां पे कायम हूँ मगर, ईमां से जा रहा हूँ |

कितनी सिमटी हैं ये प्रेरणा, और कितना ऊंचा है आसमा मेरा
कितनी धुंधली हैं ये आखें मेरी, कितना विस्तृत है ये जहाँ मेरा
चलो बिना कागज़ कलम के आज एक छंद बनायें,
अनंत की खोज में उड़ें, आओ आज अनंत हो जाएँ|

क्या कहिये इस नाजो-नजाकत को, इस चकाचौंध के दौर को
आँखों की सुर्ख़ियों को क्या कहिये, क्या कहिये अदबो-अदा के ठौर को
कहिये माफ़ी, कि हम तो बेबस कुदरत से हुआ करते हैं,
क्या कीजिये हुज़ूर, गीत तो हम आज भी, आखें मूंदें ही सुना करते हैं |

कुछ तो राबता था तेरी हस्ती से मेरा,
तू जो मिटा है, तो बाकी हम भी हैं कहाँ,
तू छूकर देख कितनी झुलसी है धरती मेरी इस सुबह ,
उगते सूरज के टुकड़े जो धुल में मिले हैं आज यहाँ|

ये चतुर् दिशाएं पंथहीन, तिस पर अंतहीन तम का सागर,
हिचकोलें खाती नौका की अब,पतवार सखी केवल तुम हो
बुझी राख के तिलक से शोभित, समर पराजित नीरस नायक
निर्झर बहती आशा का चिर अम्बार सखी केवल तुम हो
उस पार सखी केवल तुम हो|

-शशांक 

पुरानी किताब

पुरानी किताब 

दीमक के चंगुल में फंसी, 
पुरखों की पुरानी अलमारी को खोला इक रोज़
तो मधुमख्खियों के छत्तों,  
और धूल मिट्टी के आशियाने से बढ़कर भी चीज़ें 
थी उसमें बंद अरसे से
ये कुछ-कुछ समझा,कुछ जाना मैंने ,
पर कुछ समझ के परे भी सौगातें थी उसमें छुपी
मेरे इंतज़ार में मानो सदियों से बूढी होती   
उन फटे पन्नों से जाने क्या रिश्ता था मेरा 
पुर्जों को तह लगाकर सलीके से,   
क्यों रखा था बेबात किसी ने बरसों तक संजोकर    
उस पुरानी किताब में ऐसा क्या ख़ास छिपा था
जो जिंदा रहा समय से परे, 
वो वक़्त की परतों से पीले हुए पन्ने 
क्यूँ मुझे बंधक कर रहे थे 
अकारण ही अपने गहरे तिलिस्म के जालों में

खैर,वो दिन कैसे गुज़रे उस किताब के साथ
अब कुछ ख़ास याद नहीं आता मुझे   
बस कुछ धुँधली सी परछाइयां जब-तब 
उभर आती हैं मेरे चरित्र के पहलुओं में  
कुछ पंक्तियाँ यूँ ही जीवंत हो उठती हैं
उस पुरानी किताब के फटे पन्नों से
कभी रामधुन, कभी कबीर के दोहे 
कभी मीरा,खुसरो का दीवानापन याद आता है
वो अमर हुए अशफ़ाक और राम  
के बोलों को मन दोहराता है
वो अर्थी पर लेटा किसान
यूँ ही झकझोर जाता मुझे 
वो गांधी की टूटी छड़ी 
मन देख सच में घबराता है

पर फिर देख दिशा और भेड़चाल 
मैं फिर से काबिल हो जाता हूँ     
अरे ये सब तो बस मनोवेग हैं पल दो पल के 
मिथ्या पहलू मात्र हैं भाव-विह्वल मन के 
वो पुरानी किताब तो आज भी उसी अलमारी में 
बंद रखी है,
मैंने उसे पढ़ा भी या नहीं कभी क्या पता,
शायद धीरे-धीरे वो किस्से-कहानी 
तुडकर-मुड़कर खुद ही उन पन्नों में छप आये हों 
किसी सपने से हकीकत की कड़ियाँ 
ज्यों अनायास ही जुडती सी चली आयीं हों 
वो फटे पन्ने इतने पुराने--ज़रूर किसी दिन 
ख्वाब में ही देखे होंगे मैंने |

-शशांक 

अब्दुल दीवाना

कितने ख़्वाबों में खोता,
कितनी रातें न सोता,
कितनी बातों पे रोता अब्दुल दीवाना,

उठा कर सर इबादत में आसमां की ओर,
हंस पड़ा वो बेवजह पागलों की तरह,
बरसी बूँद बनकर फकीरी की शोहरतें उस पर,
हँसता चल पड़ा वो आवारा बादलों की तरह,

कभी हंसा मस्जिद के सूनेपन में शह खोजती नमाज़ पर,
हंसा कभी वो मंदिर में सदियों से सोयी मूरतों पर,
कभी फितूर पे हंसा अपने, कभी दस्तूर पर दुनिया के हंसा, 
तो कभी चाँद को अपना कहते, अपनी जैसी सूरतों पर 

वो आधे चाँद के गुरूर पर भी हंसा, 
और हंसा अकेली रात के रोने पर, 
कभी जुगनुओं के टिमटिमाने पे हंसा,
तो कभी टूटे तारों के खोने पर,

कभी हंसा वो सुन्दर कल के सपने पर,
तो कभी रंजिश में बीते सालों पर हंसा,
कभी हंसा दिलेर शायर वो खुद पर,
तो कभी अपनी हंसी उड़ाने वालों पर हंसा|     

-शशांक 

अंशुल

ये कौन भेद रहा तिमिर के चक्रव्यूह को हँसते हँसते,
ये किसकी आभा से लगता है रात छोटी है,
मेरी आँखों में प्रतिबिम्ब यूँ ही नहीं सूर्य का आज,
उस छोर से आशा बनी, दिनकर की छाया अंशुल है|

बच्चों सी बेबात हंसी में छुपी,
बेशर्त दीपित कर रहा कोई मन की चौखट
खिड़की से आती बेधड़क किरने अक्सर बताती हैं फुसफुसाकर ,
जाग मन, दिवाकर को कहाँ ढूंढ रहा आकाश में,
आज कण-कण तेरा स्वयं अंशुल है |

उस पार रौशनी है कहता कोई,
अब्दुल चल पड़ता है बिना विचारे,
संदेह का अब प्रश्न कोई क्यूँ उठे, या पैर पसारे
सुखद अंत की दृध्तम परिचायिका,
शायर की भोली कल्पना अब अंशुल है|

जब लक्ष्य तेरा संगीत बने,
संघर्ष तेरी जब प्रीत बने,
जब खुले नेत्र बरसों से सोये,
जब स्वप्न तेरे कर्तव्य में खोये,

जब क्षण को डिगती न दृष्टि तेरी,
जब पर्वत चीरे ये जल मृदुल,
तब अपना सूर्य तू खुद बना,
और आँखें तेरी बनती अंशुल|

तू चकाचौंध का चिन्ह नहीं,
और न मोहताज दिवस भर की,
कुछ अन्दर-अन्दर जल गया,
कोई पारा आज पिघल गया,

तब जाकर इक दीप जला,
मोती जनने इक सीप चला
सीप के गर्भ से चीखती बूँद की कहानी कहता,
ये अनंत सागर आज अंशुल है|

हो साथी बिछड़े भले असंख्य राह में,
अब चले हो तो मुड़कर न तकना,
ये प्रकाश फिर हो न हो,
अंशुल तुम अंशुल ही रहना|

-शशांक 



     

Thursday, August 1, 2013

तू जीना सीख जायेगा


आसमाँ की सलवटों में, गम के बादल घने है,
रत्तीभर की नोक पे, कितने अटके पड़े है।
दूर क्षितिज के पार से चिंगारी ही तो निकली थी,
अभी तो जहाँ होना है रोशन तू कैसे बुझ जायेगा,
बादल भले ही बड़े है, तेरा तेज़ न छिप पायेगा।।

उम्मीदों के धुंधलके को, शीत धैर्य खला है,
साया गहरा गया शक का तेरी आग तू ही जला है।
आपा खोकर आप पे होगा क्या हासिल तुझे,
चट्टानों की आड़ में चल, अक्ष अटल तेरा होगा,
कटु निश्चय कर दम आप के, रोज नया सवेरा होगा।।

ललचाती सीधी राहों पर, काँटे बहुत बड़े है,
लचीली कच्ची त्वचा को, चुभने को आज अड़े है।
आज रख ही दे पैर इनपर, आखिर कबतक हटाएगा,
बस एक बार ही दर्द होगा, कठोर झिल्ली तू पायेगा।
भूल समझ खिन्न होगा खुद पे, पर सहना तो सीख जायेगा,
लगा रह ऐसे ही अ मनु, तू जीना सीख जायेगा।।

                                                                                   
                                                                        'हिन्द'

Thursday, July 25, 2013

अजातशत्रु


शीर्षक-          अजातशत्रु 
छंद-              सरसी 
छंद संरचना -  १६,११ 
                    १६,११ अंत में गुरु-लघु (sl) 
                    

मैं मृदुवाचक बना हुआ था ,अंत: कपट समाय |
अजातशत्रु मैं खुद को समझू ,छाती दंभ छिपाय |
श्याम सखा अन्दर  से बोला , काहे फूला जाय |
क्रोध,मोह,आलस्य,दंभ-से,रिपु को भूला जाय ||1||


अजातशत्रु तू तभी बने जब ,क्रोध क्षमा बन जाय |
नादानी के अपराध सहे ,खड़ा-खड़ा मुस्काय |
अजातशत्रु तू तभी बनेगा ,मोह बने जब त्याग |
वंचित को अपने हिस्से से ,सौंपेगा कुछ भाग ||2||


अजातशत्रु तू तभी बने जब ,आलस हो असहाय |
किस्मत के अभिलेख भूलकर ,कर्म ध्वजा फहराय |
मधुसूदन का कर्म-संदेसा ,जन-जन तक पहुचाय |
वही निर्भय हो भाग्य रेख से ,रिपु-विहीन कहलाय ||3||

'दंभ नहीं ' - इस दंभ में  खोय , दंभ करे तू घोर |
प्रेम  घटा ना  घिर-घिर आवै ,कैसे नाचे मोर |
दंभ-अरि जब विनय मीत बने ,प्रेम किवरिया खोल |
अजातशत्रु 'परमा' तू होगा ,श्री हरि माधव बोल ||4||

                                                       --parmanand

Monday, July 22, 2013

ताटंक-छंद

ओ   मनवा !  रिश्तेदारों  से ,दूर  रहें तो  प्यारे  हैं |
साथ  गुंथने  से  दुःख  बढ़े ,अपने  भी कुप्यारे हैं |
प्यार दुलार सबै नौटंकी ,मेल-मिलाप छलावा है |
ये स्वारथ की सब झांकी है ,या मन का बहलावा है |

कुण्डलिया

या माया  का   जाल  है   ,करे    चुटीले     घात |

'परमा' तुम मूरख भये ,फिर फिर फसने जात |

फिर फिर फसने जात ,  मोह के फांस निराले |

करे   किसी   से   दूर , किसी  को गले लगा ले |

देख  मान   सनमान , तु  फूला  नहीं   समाया |

आँख सुबुधि की खोल , तज दे  मोह  या माया |

Thursday, May 2, 2013

ओ प्यारी निंदिया...


" पलके मैं पल भर मूदू ,
आशा भरे नैना मूदू .....
थक गया मैं अवचेतन आजा,
आजा अँखियो मे,
ओ प्यारी निंदिया......!!
चंदा संग खेली पूनम,
तारों संग झूली शबनम.......
अब रोशन सपने दिखलाजा,
आजा अँखियो मे,
ओ प्यारी निंदिया.......!!!! 
"< दीप >

Thursday, April 25, 2013

मैं परिवर्तन का अधिनायक हूँ


क्या राम प्रतीक्षा करता अपने बंधु-बांधव की
क्या राम साधना करता देंवो की, प्रतिमाओ की
क्या राम ठहर जाता तूफ़ानो में, मझाधारों में
क्या राम सहन करता नित नए अरिदल के आघातो को
क्या राम समझ लेता कोशिश मेरे वश में इतनी थी
क्या राम मान लेता उसके भुजदंडो की क्षमता बस इतनी थी
क्या राम समर्पण करता नियती के आलेखो को
क्या राम निम्नतर कहता भाग्य से प्रयत्नों को
नहीं, कदाचित् नहीं
राम पुरुषार्थ का पूर्ण प्रदर्शन है
राम जीवन की गति का उद्बोधन है
राम नहीं ठहरता तूफ़ानो में मझाधारों में
वह तिनका भी हो तो लड़ता उसके प्रचंड आघातो से
राम समझ ना लेता की नियती का यह लेखा है
वह भाग्य कालेख बदल देता अपने कोदंड और बाणों से
और यदि हाँ,
तो अब लक्ष्मण हमको बनाना है
इन झंझावातो में निर्भीक हो लड़ना है
रहना है उद्वेलित क्यूंकि संयम का समय नहीं
है कर्म हमारे कर में, अब कर्म की रेखा को बदलना है
है ज्ञान मुझे सिद्धांतो का नीति से उधृत भाष्यों का
है सम्मान मुझे गीता का, गीता के आदर्शो का
पर अब मेरी उत्कंठा मुझे उनसे पदच्युत करती है
मूज़े लक्ष्य को पाने को सदा उद्वेलित रखती है
अब प्रयासो के लिए नहीं परिणामों के लिए मैं चिंतित हूँ
अब आशाओ से नहीं निष्कर्षो से में बंधित हूँ
अब में उद्बोधन का नहीं उत्थानों का परिचायक हूँ
मैं दिव्यज्योति का नहीं उस विराट का दर्शन हूँ
में सीता का क्रंदन नहीं में द्रोपदी का प्रतिशोधक हूँ
है ये बाल मन की कोरी आकांक्षा ये उसका भोलापन है
ये अल्प ज्ञान का निष्कर्ष ये कम समाज का चित्रण है
आवश्कता है सहज सुदृढ़ प्रयासों की
शने शने परिस्थिति के अनुकूलन की
क्या हम उसमें सक्षम हो ये चिंतन भी आवशक है
मुझे विश्वास है तुम पर और तुम्हारे प्रयासो पर
क्यूंकी में इस उत्कंठा से अभिमंत्रित हूँ.
क्षमाप्रार्थी हूँ सहयोग तुम्हारा ना दे पाउँगा
अपने मन की इस श्लागा को अब में समेट ना पाउँगा
अब मैं अपने अश्वो को बंध मुक्त कर देता हूँ
मैं गीत नहीं बन सकता में उद्घोष बनने निकला हूँ
मैं हस्त लगाव नहीं दिखा पाउँगा, एक प्रहार ही कर देता हूँ
मैं संयमित ज्ञानी नहीं में उद्वेलित अज्ञानी हूँ
मैं जीवन का मधुर राग नहीं में कर्कश कोलाहल हूँ
मैं अनुकूलन का नहीं परिवर्तन का अधिनायक हूँ
---प्रणव

Tuesday, April 23, 2013

इक दफे

 

अब ये ख्वाब फिर इक दफे,


मेरी आँखों में उतर भी आये तो क्या

 
तू मिले फिर उसी दोराहे पर चलते हुए इक दफे

 
फिर नज़रें इक दफे हमारी मिल भी जाएँ तो क्या


अब गहरा, खाली वो कुआं है जहाँ झांकता हूँ मैं 


मेरी बस मेरी धडकनें गूंजती हैं वहां


फिर उस गूँज को तेरी धड़कन समझ,


मैं इक दफे अनमने से मुस्कुरा भी पाऊं तो क्या 


यहाँ सड़कें टेढ़ी-मेढ़ी है, लकीरें गाढ़ी उकेरी हैं 


जब कोई फर्क नहीं किसी बात से तुझे अब 


फिर क्या याद करूँ तुझे एक दफे ,


इक दफे तुझे भूल भी जाऊं तो क्या

                               ---Shashank Jha

Friday, April 19, 2013

ओस की बूँद

                                           From the heart flowing with fluid of winter

अम्बर गूढ़ चिंतन में ठहरा,
नम लोचन सहमी-सहमी,
ओस की बूँद छलक कर तैर रही।
आर-पार तरल तेज़ की फुहार,
क्या धुँधला पायेगा, ये बेवक्त कोहरा ?
अटल रुख की कशिश कठोर,
क्षितिज मृग बन रीझ रहा।
एक बूँद जैम गयी कड़क कंधो पर।
शीत बाण, ओस के आगोश से चले,
कैसे सहेगा, पाले का ये चेहरा ?
समीर विलेन बनी, मध्य कहरा रहा,
काँपती जड़े नयी उखड जाने को,
सख्त बनाने को, गिरे छींटे ओस के।
कवच दुर्लभ संग, पकने की चाह,
कब तक रोकेगा, बागी बदलियों का प्रहरा ?

                                                                                                'हिन्द' 

अ मनु ये तूने क्या किया ?


अ मनु ये तूने क्या किया ?
आरोह पथ दुर्गम लक्ष्य को,
आधार ही तेरा डोल रहा ।
तू काट रहा तू छोड़ रहा ,
तेरी ही डोर तेरा ही डेरा ।।
अ मनु ये तूने क्या किया ?



वक्त सागर ताल में, अंधेर निश्चित शैल को,
चंद मिथ्या चाँद तू खोज रहा ।
तू लूटा रहा , तू डूबा रहा ,
तेरी ही बस्ती, तेरी कश्ती का सवेरा ।।
अ मनु ये तूने क्या किया ?



तेरे रुग्ण खलिहान में, दोषी पुष्प घने थे,
पर मुझसे थोपित तेरे विवेक ने ,
गंध सुंगंध को एक किया ।
क्या सुना, क्या न सुना इनसे ,
पर झोली से पुष्प बिखेरने को ,
पूरा खलिहान ही मिटा दिया ।।
अ मनु ये तूने क्या किया ?


                                                   'हिन्द' 


Monday, April 8, 2013

स्वधर्म एवं स्वभाव



जीवन के किसी ना किसी पड़ाव पर यह प्रश्न अवश्य आता ही है ; मेरा लक्ष्य क्या है ? मुझे क्या करना चाहिए ? मेरे जीवन की दिशा क्या होगी ?
किसी श्रेष्ठ पुरुष ने कहा हे “जो तुम्हारे ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ के अनुकूल हो वही करो |”
बात बहुत सूक्ष्म हे किन्तु उतनी ही गूढ़ भी| आवश्यकता हमे इसके मूल को समझने की है, तत्पश्च्यात शायद निर्णय इतना कठिन ना हो | ‘स्वधर्म’ को समझने से पूर्व शायद हम अपने विवेक से ‘धर्म’ शब्द को समझे, ‘धर्म’ क्या किसी ईश्वर में विश्वास, किसी परंपरागत पूजा पद्धति को मानना है ? मेरे विचार में धर्म मनुष्य के सहज क्रमिक विकास(evolution) से विकसित हुए नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का अनुसरण एवं सहज प्रवाह मात्र है |
बात आती है ‘स्वधर्म’ की , एक राजा का स्वधर्म है अपनी सम्पूर्ण प्रजा की देखभाल एवं सुरक्षा करना, एक कुम्हार का ‘स्वधर्म’ है उत्तम से उत्तम मटके बनाना , एक पुत्र का स्वधर्म
है अपने माता पिता की सेवा | उदहारण अत्यंत सरल एवं सुपाच्य है ; अब बात आती है हमारे स्वधर्म की | प्रश्न का उत्तर सहज रूप से स्वयं के भीतर से ही आना सर्वोत्तम है | हमारी वर्तमान स्तिथि में जितना योगदान हमारी कुशाग्रता का है उतना ही इस देश समाज का है जिसने हमे यह माध्यम या मंच प्रदान किया | जहाँ हमारी प्रतिभा को सही दिशा मिल सके | मेरे मत में यदि हम देश के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान में पढ़ रहे है तो हमारा दायित्व है की हम राष्ट्र ,समाज एवं विश्व के कल्याण के लिए कुछ करे | किन्तु , हमें इसे उऋण होने के रूप में ना लेकर निज कर्तव्य समझना चाहिए |
‘स्वधर्म’ से मेरा तात्पर्य यह नहीं है की हम में से हर एक वैज्ञानिक बने या प्रोध्योकिकी का अध्भुत नमूना प्रस्तुत करे | ना ये सही है और ना ही इसकी आवश्यकता है | स्वधर्म का संक्षिप्त अर्थ दायित्वबोध है |
पूर्व उदाहरण में देखे ; यदि उस राजा की रूचि जीवन के किसी भी और पहलु से अधिक संगीत में है, तो क्या वो गलत है ? यदि उस कुम्हार के पुत्र की रूचि मटके बनाने में ना होकर खगोलियो पिंडो के अध्ययन में है, तो क्या ये गलत है ? मेरे
मत में तो नहीं | यह उनकी प्रकृति है और वे स्वयं इसके स्वामी है | किन्तु क्या वे एक उपयुक्त राजा या श्रेष्ठ कुम्हार बन सकते है , इस प्रश्न का उत्तर भी ना ही है |हमारी परिस्थिति इनसे पूर्णतयाः भिन्न है | ना हम इनकी भांति पारिवारिक एवं अनुवांशिक कार्य करने को बाध्य है ना हम पर किसी खास कार्य को करने का दबाव है | आज हम हमारे सभी निर्णय लेने में स्वतन्त्र तथा समर्थ है | तो क्यों ना हम सर्वप्रथम समय देकर अपने स्वभाव को समझे | क्या मुझे वाकई ‘कोडिंग’ में रूचि है या ये मात्र अर्थ(धन) का प्रलोभन है ? क्या मुझे वास्तव में अपने क्षेत्र(ब्रांच) में लगाव है या मात्र अच्छा परिणाम(सी.जी.) बनाए रखने का प्रयास मात्र है ?
IIT जैसे स्तरीय संस्था में हम विकल्पों से बंधे हुए नहीं है; हमारे समक्ष एक विशाल मैदान है, हम में उर्जा है बस हमे दिशा निर्धारण करना है | अतः हमें जरुरत है तो आत्मचिंतन की एवं एक स्फूर्ति की जो हमे अपने अपने लक्ष्य की ओर संलग्न रख सके |
जब हम अपने ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ को भलीभांति समझ लेंगे तब हम निश्चय ही एक अत्यधिक संतुष्ट, सफल एवं
समाजोपयोगी मनुष्य बनेंगे तथा विकास के क्रम में प्रत्यक्ष भागीदार बनेंगे |
एक प्रश्न जो सहज में आता है , यदि ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ दोनों विपरीतगामी हो तो ? मेरे विचार में यह जिज्ञासा ना होकर ठीक से मनन ना करने तथा सभी प्रकार से आत्मावलोकन ना करने का परिणाम है | इस वृहद संसार की एक जीवमान इकाई होने के नाते हमे आवश्यकता है अपने ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ में तादम्यता लाने की अन्यथा हमारा मिथ्या स्वभाव अकर्मण्यता के आवरण में लिपटा हमें अवनति की ओर अग्रेषित करेगा |
इति ||

प्रणव