Thursday, April 25, 2013

मैं परिवर्तन का अधिनायक हूँ


क्या राम प्रतीक्षा करता अपने बंधु-बांधव की
क्या राम साधना करता देंवो की, प्रतिमाओ की
क्या राम ठहर जाता तूफ़ानो में, मझाधारों में
क्या राम सहन करता नित नए अरिदल के आघातो को
क्या राम समझ लेता कोशिश मेरे वश में इतनी थी
क्या राम मान लेता उसके भुजदंडो की क्षमता बस इतनी थी
क्या राम समर्पण करता नियती के आलेखो को
क्या राम निम्नतर कहता भाग्य से प्रयत्नों को
नहीं, कदाचित् नहीं
राम पुरुषार्थ का पूर्ण प्रदर्शन है
राम जीवन की गति का उद्बोधन है
राम नहीं ठहरता तूफ़ानो में मझाधारों में
वह तिनका भी हो तो लड़ता उसके प्रचंड आघातो से
राम समझ ना लेता की नियती का यह लेखा है
वह भाग्य कालेख बदल देता अपने कोदंड और बाणों से
और यदि हाँ,
तो अब लक्ष्मण हमको बनाना है
इन झंझावातो में निर्भीक हो लड़ना है
रहना है उद्वेलित क्यूंकि संयम का समय नहीं
है कर्म हमारे कर में, अब कर्म की रेखा को बदलना है
है ज्ञान मुझे सिद्धांतो का नीति से उधृत भाष्यों का
है सम्मान मुझे गीता का, गीता के आदर्शो का
पर अब मेरी उत्कंठा मुझे उनसे पदच्युत करती है
मूज़े लक्ष्य को पाने को सदा उद्वेलित रखती है
अब प्रयासो के लिए नहीं परिणामों के लिए मैं चिंतित हूँ
अब आशाओ से नहीं निष्कर्षो से में बंधित हूँ
अब में उद्बोधन का नहीं उत्थानों का परिचायक हूँ
मैं दिव्यज्योति का नहीं उस विराट का दर्शन हूँ
में सीता का क्रंदन नहीं में द्रोपदी का प्रतिशोधक हूँ
है ये बाल मन की कोरी आकांक्षा ये उसका भोलापन है
ये अल्प ज्ञान का निष्कर्ष ये कम समाज का चित्रण है
आवश्कता है सहज सुदृढ़ प्रयासों की
शने शने परिस्थिति के अनुकूलन की
क्या हम उसमें सक्षम हो ये चिंतन भी आवशक है
मुझे विश्वास है तुम पर और तुम्हारे प्रयासो पर
क्यूंकी में इस उत्कंठा से अभिमंत्रित हूँ.
क्षमाप्रार्थी हूँ सहयोग तुम्हारा ना दे पाउँगा
अपने मन की इस श्लागा को अब में समेट ना पाउँगा
अब मैं अपने अश्वो को बंध मुक्त कर देता हूँ
मैं गीत नहीं बन सकता में उद्घोष बनने निकला हूँ
मैं हस्त लगाव नहीं दिखा पाउँगा, एक प्रहार ही कर देता हूँ
मैं संयमित ज्ञानी नहीं में उद्वेलित अज्ञानी हूँ
मैं जीवन का मधुर राग नहीं में कर्कश कोलाहल हूँ
मैं अनुकूलन का नहीं परिवर्तन का अधिनायक हूँ
---प्रणव

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