Friday, April 19, 2013

ओस की बूँद

                                           From the heart flowing with fluid of winter

अम्बर गूढ़ चिंतन में ठहरा,
नम लोचन सहमी-सहमी,
ओस की बूँद छलक कर तैर रही।
आर-पार तरल तेज़ की फुहार,
क्या धुँधला पायेगा, ये बेवक्त कोहरा ?
अटल रुख की कशिश कठोर,
क्षितिज मृग बन रीझ रहा।
एक बूँद जैम गयी कड़क कंधो पर।
शीत बाण, ओस के आगोश से चले,
कैसे सहेगा, पाले का ये चेहरा ?
समीर विलेन बनी, मध्य कहरा रहा,
काँपती जड़े नयी उखड जाने को,
सख्त बनाने को, गिरे छींटे ओस के।
कवच दुर्लभ संग, पकने की चाह,
कब तक रोकेगा, बागी बदलियों का प्रहरा ?

                                                                                                'हिन्द' 

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