Sunday, August 11, 2013

"एक गाथा ऐसी भी"

मुझे फिराया बहुत दिनों तक ,

नहीं लगती थी हाथ । 

मुझसे एक नहीं फसती थी ,

औरों से फंस जात ।

 चंचल थी जल की भांति '

छनकीली सी देह । 

आज फसी है जाल में ,

अब नाही संदेह । 

ले चला में उसे चने के खेत में ,

जहां लगाईं घात । 

उज्जवल गाथा सुनो वहा की ,

मधुर चांदनी रात ।

ऐसा आज मसलू इसको ,

दिल की आग बुझाय ।

मखमल सी उस मेढ़ पे ,

इसे पटक दूँ जाय । 

पिंजरा खोला जाय खेत पर ,

इक दंभ भरे अहसास में ।

 दै भागी वो चुहिया ,

गुम  हो गई उस घास में ।

 बाल नोंचू माथा ठोकूं ,

उस दिन पछताया खेत पे । 

' परमानन्द ' बहुत खीजा फिर ,

चुहिया से चेक-मेट पे । 

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