किसी श्रेष्ठ पुरुष ने कहा हे “जो तुम्हारे ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ के अनुकूल हो वही करो |”
बात बहुत सूक्ष्म हे किन्तु उतनी ही गूढ़ भी| आवश्यकता हमे इसके मूल को समझने की है, तत्पश्च्यात शायद निर्णय इतना कठिन ना हो | ‘स्वधर्म’ को समझने से पूर्व शायद हम अपने विवेक से ‘धर्म’ शब्द को समझे, ‘धर्म’ क्या किसी ईश्वर में विश्वास, किसी परंपरागत पूजा पद्धति को मानना है ? मेरे विचार में धर्म मनुष्य के सहज क्रमिक विकास(evolution) से विकसित हुए नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का अनुसरण एवं सहज प्रवाह मात्र है |
बात आती है ‘स्वधर्म’ की , एक राजा का स्वधर्म है अपनी सम्पूर्ण प्रजा की देखभाल एवं सुरक्षा करना, एक कुम्हार का ‘स्वधर्म’ है उत्तम से उत्तम मटके बनाना , एक पुत्र का स्वधर्म
है अपने माता पिता की सेवा | उदहारण अत्यंत सरल एवं सुपाच्य है ; अब बात आती है हमारे स्वधर्म की | प्रश्न का उत्तर सहज रूप से स्वयं के भीतर से ही आना सर्वोत्तम है | हमारी वर्तमान स्तिथि में जितना योगदान हमारी कुशाग्रता का है उतना ही इस देश समाज का है जिसने हमे यह माध्यम या मंच प्रदान किया | जहाँ हमारी प्रतिभा को सही दिशा मिल सके | मेरे मत में यदि हम देश के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थान में पढ़ रहे है तो हमारा दायित्व है की हम राष्ट्र ,समाज एवं विश्व के कल्याण के लिए कुछ करे | किन्तु , हमें इसे उऋण होने के रूप में ना लेकर निज कर्तव्य समझना चाहिए |
‘स्वधर्म’ से मेरा तात्पर्य यह नहीं है की हम में से हर एक वैज्ञानिक बने या प्रोध्योकिकी का अध्भुत नमूना प्रस्तुत करे | ना ये सही है और ना ही इसकी आवश्यकता है | स्वधर्म का संक्षिप्त अर्थ दायित्वबोध है |
पूर्व उदाहरण में देखे ; यदि उस राजा की रूचि जीवन के किसी भी और पहलु से अधिक संगीत में है, तो क्या वो गलत है ? यदि उस कुम्हार के पुत्र की रूचि मटके बनाने में ना होकर खगोलियो पिंडो के अध्ययन में है, तो क्या ये गलत है ? मेरे
मत में तो नहीं | यह उनकी प्रकृति है और वे स्वयं इसके स्वामी है | किन्तु क्या वे एक उपयुक्त राजा या श्रेष्ठ कुम्हार बन सकते है , इस प्रश्न का उत्तर भी ना ही है |हमारी परिस्थिति इनसे पूर्णतयाः भिन्न है | ना हम इनकी भांति पारिवारिक एवं अनुवांशिक कार्य करने को बाध्य है ना हम पर किसी खास कार्य को करने का दबाव है | आज हम हमारे सभी निर्णय लेने में स्वतन्त्र तथा समर्थ है | तो क्यों ना हम सर्वप्रथम समय देकर अपने स्वभाव को समझे | क्या मुझे वाकई ‘कोडिंग’ में रूचि है या ये मात्र अर्थ(धन) का प्रलोभन है ? क्या मुझे वास्तव में अपने क्षेत्र(ब्रांच) में लगाव है या मात्र अच्छा परिणाम(सी.जी.) बनाए रखने का प्रयास मात्र है ?
IIT जैसे स्तरीय संस्था में हम विकल्पों से बंधे हुए नहीं है; हमारे समक्ष एक विशाल मैदान है, हम में उर्जा है बस हमे दिशा निर्धारण करना है | अतः हमें जरुरत है तो आत्मचिंतन की एवं एक स्फूर्ति की जो हमे अपने अपने लक्ष्य की ओर संलग्न रख सके |
जब हम अपने ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ को भलीभांति समझ लेंगे तब हम निश्चय ही एक अत्यधिक संतुष्ट, सफल एवं
समाजोपयोगी मनुष्य बनेंगे तथा विकास के क्रम में प्रत्यक्ष भागीदार बनेंगे |
एक प्रश्न जो सहज में आता है , यदि ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ दोनों विपरीतगामी हो तो ? मेरे विचार में यह जिज्ञासा ना होकर ठीक से मनन ना करने तथा सभी प्रकार से आत्मावलोकन ना करने का परिणाम है | इस वृहद संसार की एक जीवमान इकाई होने के नाते हमे आवश्यकता है अपने ‘स्वधर्म’ एवं ‘स्वभाव’ में तादम्यता लाने की अन्यथा हमारा मिथ्या स्वभाव अकर्मण्यता के आवरण में लिपटा हमें अवनति की ओर अग्रेषित करेगा |
इति ||
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