Friday, August 23, 2013

जीवन की क्षण-भंगुरता

शीर्षक          : जीवन की क्षण-भंगुरता 

छंद              : रुचिरा (मात्रिक)

छंद-संरचना :१६,१४ 

                      १६,१४ 

                      अंत में एक गुरू।  


पवन जगाता अलख नज़ारे , चमक  दामिनी अम्बर में।
खलबल खलबल सिन्धु हो रहा ,प्राण काल  के है कर में।
नीर-समीर  मिले   तब  ऐसे , बरसों  बिछड़े  यार  मिले।
क्रुद्ध  धुंध  की  आतुर  बाहें , जीव  अजीव  अलिंगन  ले।
निर्दय दानव सिन्धु हो रहा ,निगलन लगा जलयान को।
अब  तक  समझ नही पाया रे ,प्रभु  के विप्लव-गान को।
चटख  सुंदरी  माधव  गढ़ की ,बन  के  मॉडल   दंभ करे।
विलय  हो  रही  जल में काया , रक्त  उदधि  में रंग भरे।
अतिवादी!  आतंक  तुम्हारा , था  तुच्छ  इस आतंक से।
सता  रही  तुझको  भी  दहशत , तू  डर रहा इस जंग से।
रे व्यापारी!  कित   गया  दंभ ?  हो  रहा सौदा जान का।
बलवंत  सागर  ठग  रहा  है , इह  माल सब व्यापार का।
एक  गत  सब की  है हो गई , महज वेश्या ; या छात्र हो।
जीवन  क्षण-भंगुर है'परमा' ,ज्यों कांच का इक पात्र हो। 

                                                                                                     --परमानंद 

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