ये कौन भेद रहा तिमिर के
चक्रव्यूह को हँसते हँसते,
ये किसकी आभा से लगता है
रात छोटी है,
मेरी आँखों में प्रतिबिम्ब
यूँ ही नहीं सूर्य का आज,
उस छोर से आशा बनी, दिनकर
की छाया अंशुल है|
बच्चों सी बेबात हंसी में
छुपी,
बेशर्त दीपित कर रहा कोई मन
की चौखट
खिड़की से आती बेधड़क किरने
अक्सर बताती हैं फुसफुसाकर ,
जाग मन, दिवाकर को कहाँ
ढूंढ रहा आकाश में,
आज कण-कण तेरा स्वयं अंशुल
है |
उस पार रौशनी है कहता कोई,
अब्दुल चल पड़ता है बिना
विचारे,
संदेह का अब प्रश्न कोई
क्यूँ उठे, या पैर पसारे
सुखद अंत की दृध्तम परिचायिका,
शायर की भोली कल्पना अब
अंशुल है|
जब लक्ष्य तेरा संगीत बने,
संघर्ष तेरी जब प्रीत बने,
जब खुले नेत्र बरसों से
सोये,
जब स्वप्न तेरे कर्तव्य में
खोये,
जब क्षण को डिगती न दृष्टि
तेरी,
जब पर्वत चीरे ये जल मृदुल,
तब अपना सूर्य तू खुद बना,
और आँखें तेरी बनती अंशुल|
तू चकाचौंध का चिन्ह नहीं,
और न मोहताज दिवस भर की,
कुछ अन्दर-अन्दर जल गया,
कोई पारा आज पिघल गया,
तब जाकर इक दीप जला,
मोती जनने इक सीप चला
सीप के गर्भ से चीखती बूँद
की कहानी कहता,
ये अनंत सागर आज अंशुल है|
हो साथी बिछड़े भले असंख्य राह
में,
अब चले हो तो मुड़कर न तकना,
ये प्रकाश फिर हो न हो,
अंशुल तुम अंशुल ही रहना|
-शशांक
-शशांक
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