आसमाँ की सलवटों में, गम के बादल घने है,
रत्तीभर की नोक पे, कितने अटके पड़े है।
दूर क्षितिज के पार से चिंगारी ही तो निकली थी,
बादल भले ही बड़े है, तेरा तेज़ न छिप पायेगा।।
साया गहरा गया शक का तेरी आग तू ही जला है।
आपा खोकर आप पे होगा क्या हासिल तुझे,
चट्टानों की आड़ में चल, अक्ष अटल तेरा होगा,
कटु निश्चय कर दम आप के, रोज नया सवेरा होगा।।
ललचाती सीधी राहों पर, काँटे बहुत बड़े है,
लचीली कच्ची त्वचा को, चुभने को आज अड़े है।
आज रख ही दे पैर इनपर, आखिर कबतक हटाएगा,
बस एक बार ही दर्द होगा, कठोर झिल्ली तू पायेगा।
भूल समझ खिन्न होगा खुद पे, पर सहना तो सीख जायेगा,
लगा रह ऐसे ही अ मनु, तू जीना सीख जायेगा।।'हिन्द'

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