अंतिम कथन
खुश
नहीं हूँ आज मैं , खो गया मेरा वो सबकुछ
संभाले रखा था वर्षों से संजोकर
जो कुछ अपने भीतर।
खुश नहीं हूँ आज मैं , छीन गया मेरा वो सबकुछ
जो भी था मेरा था ,
मेरा अधिकार , मेरा सम्मान , मेरे सपने
बस यही था मेरे पास
जोकि आज मेरा नहीं। ।
ज़रा सोचा भी नहीं था तूने
उस वक़्त ,
जब लूट रहा था मुझे
कि मैं क्या हूँ ? मैं कौन हूँ ?
काम क्या है मेरा और मेरे सपने ?
ज़रा देखा भी नहीं था तूने
मेरे दर्द को
जो चीख - चीख कर मेरी जुबां , कर रही थी बयां
और मेरी आँखे ,
अब जो नहीं है
इस दुनिया को देखने की इच्छुक
क्योंकि देख ली है मैंने दुनिया
कि होती है कितनी सुन्दर और कितनी अच्छी
और देखा है मैंने इसका वो रूप भी
जो काश !
कोई ना देखे
पर सोचें सभी
मेरे दर्द को , मेरे इस कष्ट को।
क्या लौटा सकता है उसे जो छीन गया है मेरा ?
क्या है कोई जो दे सकता है मेरा सबकुछ वापस ?
नहीं-नहीं , नहीं-नहीं
मुझे पता है इस बात का
भलीभांति।
खूब देख ली मैंने ये ज़िंदगी और ये सपने
अब और चाह नहीं कि देख लिया मैंने वो भी जिसके कारण
अब खुश हूँ मैं
कि मैंने देखा इस दुनिया का वो रूप भी जो था
सबसे भयावह , सबसे डरावना , सबसे भयंकर।
ये ख़ुशी है कि अब सही नहीं जाती
ये आंसू हैं , कि थामे नहीं जाते
ये जुबां भी और स्वर भी
नहीं देते साथ मेरा
और अब न ये कलम।
---गुंजन बेलवंशी
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