Sunday, August 11, 2013

"नवोदय-होली"

जब-जब गूंजे इन कानों में ; होली के किलकारे ।

तब-तब जी उठते यादों के ; सुन्दर से गलियारे ।

उत्साहित हो बाहर आ जाते ; कर के झटपट नेत्र-निमीलन ।

सारे साथी खड़े ग्राउंड में ; हैप्पी होली रंग मिलन ।

चुपचाप खड़े हो मेस देखता ; नवोदय की होली-लीला ।

पांच सैकड़े लोग इकट्ठे ; तिस पर डी जे भड भड़कीला ।

अनंत ख़ुशी खिल उठी रंग की ; चंद झडकियों पर ही ।

मौक़ा पाकर अजमा लेते ; कुछ रंग लड़कियों पर भी ।

रंग-गुलाल से भूत बने ; कछु मंच पे नाच लगे करने ।

कछु दौड़े कछु पीछू धावै ; सबकी जेब लगे हरने ।

' जेब-फाड़ आन्दोलन ' भैया ; न कौनो की जेब बचे ।

फिर पकर धरें गड्ढे माहीं ; कीचड़ से सुन्दर देह रचे ।

कछु 'स्कूल बिल्डिंग' को दौड़ पड़े ; कछु जंगल की गैल धरी।

साथ से सत्तर लगे ढुढैय्या ;मिल जाबे तो खैर नहीं ।

                   गिरत पडत जात ।

                   भागत भगत जात ।

                   देखत न आन-ताव ;

                   शूलहु चुभत जात । 

                   ढूंढ़त खुर्राए बांकी ;

                   पंक से आपंक भये । 

                   पंक के खिलाड़ियन की ;

                   टीम अब बढ़त जात ।

याद है वो  दहन होलिका ; जी भर नाचे खोये से । 

"कल छूट जायेगी स्वर्ग-धरा ये " ; फूट-फूट कर रोये थे ।

बता हठीले भाग्य हमारे ; फिर कब वो होली आएगी ?

जब एक साथ मिल प्रेम गगन में ; रंग घटा घेरायेगी । 

मानसरोवर सुध-सरोज ; धरो मधुकोष सुटारो । 

'परमानन्द'भयो आनंद ; यो चख मकरंद को स्वाद निरालो । 

                                                                         --Parmanand

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