Monday, August 19, 2013

कविता

एक बार शीशे में उतार के तो देखो।
दिल के विचारो को उभार के तो देखो।।

कभी ख़ुशी, कभी गम 
कभी दिल की धकधक नज़र आएगी। 
कभी माफ़ी ,कभी प्रहार
आँखों की चमक नज़र आएगी। 
कभी गुस्सा, कभी डर 
अपनी महक नज़र आएगी। 

एक बार शीशे में उतार के तो देखो।
दिल के विचारो को उभार के तो देखो।।

कभी मोहब्बत की दास्ताँ 
कभी नफरत की कहानी की रूपक नज़र आएगी। 
उस वक़्त उमड़े एहसासों की 
एक झलक नज़र आएगी। 
कभी उल्लास कभी दुःख में हुई नम 
आँख की वो पलक नज़र आएगी। 

एक बार शीशे में उतार के तो देखो।
दिल के विचारो को उभार के तो देखो।।

कभी अच्छाइयों के लिए बजाती तालियाँ 
कभी बुराइयों की दबाती हलक नज़र आएगी। 
कभी प्रशंसा कभी धुत्कार 
कभी फटकार कड़क नज़र आएगी। 
पुराणी कुरीतियों के ख़राब बीजों से दूर 
नयी पीड़ी की, नयी रीत की, नयी कनक नज़र आएगी। 

एक बार शीशे में उतार के तो देखो।
दिल के विचारो को उभार के तो देखो।।

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