अब ये ख्वाब फिर इक दफे,
मेरी आँखों में उतर भी आये तो क्या
तू मिले फिर उसी दोराहे पर चलते हुए इक दफे
फिर नज़रें इक दफे हमारी मिल भी जाएँ तो क्या
अब गहरा, खाली वो कुआं है जहाँ झांकता हूँ मैं
मेरी बस मेरी धडकनें गूंजती हैं वहां
फिर उस गूँज को तेरी धड़कन समझ,
मैं इक दफे अनमने से मुस्कुरा भी पाऊं तो क्या
यहाँ सड़कें टेढ़ी-मेढ़ी है, लकीरें गाढ़ी उकेरी हैं
जब कोई फर्क नहीं किसी बात से तुझे अब
फिर क्या याद करूँ तुझे एक दफे ,
इक दफे तुझे भूल भी जाऊं तो क्या
---Shashank Jha
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