इक शर्त थी इलाही तेरी, वही बेशर्त निभा रहा हूँ
छलनी है सीना मगर, मैं गीत गा रहा हूँ
वादा था बन्दे से तेरे, या जिद थी कभी न गाने की.. अब याद नहीं
जुबां पे कायम हूँ मगर, ईमां से जा रहा हूँ |
कितनी सिमटी हैं ये प्रेरणा, और कितना ऊंचा है आसमा मेरा
कितनी धुंधली हैं ये आखें मेरी, कितना विस्तृत है ये जहाँ मेरा
चलो बिना कागज़ कलम के आज एक छंद बनायें,
अनंत की खोज में उड़ें, आओ आज अनंत हो जाएँ|
क्या कहिये इस नाजो-नजाकत को, इस चकाचौंध के दौर को
आँखों की सुर्ख़ियों को क्या कहिये, क्या कहिये अदबो-अदा के ठौर को
कहिये माफ़ी, कि हम तो बेबस कुदरत से हुआ करते हैं,
क्या कीजिये हुज़ूर, गीत तो हम आज भी, आखें मूंदें ही सुना करते हैं |
कुछ तो राबता था तेरी हस्ती से मेरा,
तू जो मिटा है, तो बाकी हम भी हैं कहाँ,
तू छूकर देख कितनी झुलसी है धरती मेरी इस सुबह ,
उगते सूरज के टुकड़े जो धुल में मिले हैं आज यहाँ|
छलनी है सीना मगर, मैं गीत गा रहा हूँ
वादा था बन्दे से तेरे, या जिद थी कभी न गाने की.. अब याद नहीं
जुबां पे कायम हूँ मगर, ईमां से जा रहा हूँ |
कितनी सिमटी हैं ये प्रेरणा, और कितना ऊंचा है आसमा मेरा
कितनी धुंधली हैं ये आखें मेरी, कितना विस्तृत है ये जहाँ मेरा
चलो बिना कागज़ कलम के आज एक छंद बनायें,
अनंत की खोज में उड़ें, आओ आज अनंत हो जाएँ|
क्या कहिये इस नाजो-नजाकत को, इस चकाचौंध के दौर को
आँखों की सुर्ख़ियों को क्या कहिये, क्या कहिये अदबो-अदा के ठौर को
कहिये माफ़ी, कि हम तो बेबस कुदरत से हुआ करते हैं,
क्या कीजिये हुज़ूर, गीत तो हम आज भी, आखें मूंदें ही सुना करते हैं |
कुछ तो राबता था तेरी हस्ती से मेरा,
तू जो मिटा है, तो बाकी हम भी हैं कहाँ,
तू छूकर देख कितनी झुलसी है धरती मेरी इस सुबह ,
उगते सूरज के टुकड़े जो धुल में मिले हैं आज यहाँ|
ये चतुर् दिशाएं पंथहीन, तिस पर अंतहीन तम का सागर,
हिचकोलें खाती नौका की अब,पतवार सखी केवल तुम हो
बुझी राख के तिलक से शोभित, समर पराजित नीरस नायक
निर्झर बहती आशा का चिर अम्बार सखी केवल तुम हो
उस पार सखी केवल तुम हो|
-शशांक
हिचकोलें खाती नौका की अब,पतवार सखी केवल तुम हो
बुझी राख के तिलक से शोभित, समर पराजित नीरस नायक
निर्झर बहती आशा का चिर अम्बार सखी केवल तुम हो
उस पार सखी केवल तुम हो|
-शशांक
उस पार सखी केवल तुम हो|.......................vah vah!!
ReplyDeleteशुक्रिया!!
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