Sunday, August 11, 2013

समग्रता



इस जगत के इतिहास एवं प्रकृति की साक्ष्यता के आधार पर,  मनुष्य ही विकास का पर्याय बन चूका है। ये  विकास एक ही दिशा में भी हो सकता है और बहुगामी भी, आंशिक भी हो सकता है और पूर्ण भी, धर्म के अनुरूप भी हो सकता है और प्रतिकूल भी।
आत्मा व् बुद्धि, दोनों ही मनुष्य के व्यवहार के आधर पर ही विकसित होते हैं। यद्यपि आत्मा का पूर्ण विकास असंभव है पर अपनी चिंतन शक्ति के बल पर प्राणी अपनी बुद्धि को एक केन्द्रित विषय के लिए मजबूत कर सकता है, जिसे समग्रता कहा जाता है।

समग्रता धर्म-अधर्म, सत्य या असत्य पर निर्भर नहीं होती। ये तो केवल तटस्थ रूप में प्रबलता की द्योतक है, एक ही निर्धारित, विषय के लिए, चाहे उस विषय की प्रकृति कुछ भी हो। यद्यपि समग्रता को बहुगामी तो नहीं कहा जा सकता किन्तु एक विषय से सम्बंधित सभी पहलुओं में सामर्थ्य विकसित करने लिए ये बहुगामी भी हो सकती है।            
विषय में निहित तथ्यों के विश्लेषण की पुनरावृति में ही, समग्रता का मूल भाव विक्षिप्त है। अतः अभ्यास ही समग्रता की नींव है। तथ्यों के अन्वेषण के पश्चात् उन पर मनन करना ही अभ्यास की प्रकृति होनी चाहिए। इस सम्पूर्ण अभियान की ताकत है सशक्त सम्प्रेषण। 
सम्प्रेषण न केवल प्राणी की मानसिकता का परिचायक है वरन ये तो विषय के अभ्यास एवं विश्लेषण का भी प्रबल माध्यम है । समग्रता की और अग्रसर मनुष्य को अपने मानसिक व्यक्तित्व के हर उस पहलू की बारीकी से परखना होता है जो की निर्धारित विषय से सम्बंधित है ।  विकास का सर्वश्रेष्ठ साक्ष्य, सम्प्रेषण ही उपलब्ध करा सकता है ।
 स्वयं के सामर्थ्य की अनुभूति  या तो सशक्त सम्प्रेषण से होता है अथवा फिर स्थिर मौन भाव से ।  यद्यपि दोनों ही तत्त्व प्रकृति में एक-दुसरे से विपरीत है किन्तु अपने अपने क्षेत्र के आधार पर इनका परिणाम एक ही होता है, अनुभूति ।बुद्धि के सामर्थ्य की अनुभूति सम्प्रेषण में होती है, वही आत्मा के सामर्थ्य की अनुभूति मौन से ही निश्चित की जाती है ।
अतः सम्प्रेषण के माध्यम के बिना प्राणी अभ्यास और विश्लेषण  में कमी दक्ष नही हो पायेगा और वहीँ अच्छे सम्प्रेषण के लिए निरंतर अभ्यास भी आवश्यक है।
यदि आत्मा सकारात्मक रूप में मष्तिष्क पर नियंत्रण रखती है तो भी विचार तो सुदृढ़ हो जयेंगे किन्तु समग्रता केवल सम्प्रेषण की शक्ति से ही संभव है और सम्प्रेषण केवल अभ्यास से। अतः समग्रता का मूल कारक अभ्यास ही है। 

                                                                                                                      'हिन्द' 


1 comment:

  1. यार हिमांशु मचाते हो आप !
    कितनी maturity है आपकी लेखनी मे !!
    god....!!!

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