Monday, April 8, 2013

गौरव


यह कहानी पूर्णतयाः काल्पनिक है , इसका किसी जीवित अथवा मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है | यदि ऐसा है तो इसे मात्र संयोग माना जाए , यह कहानी लेखक की स्वप्रेरणा तथा कल्पनाशीलता की उपज है इसे व्यक्ति विशेष से सम्बंधित मानना कला का अपमान होगा

गौरव

गौरव एक सुना सुना सा नाम , नाम सुनते ही आपके मष्तिष्क पटल पर कोई ना कोई चित्र उभर आया होगा | खेर ! ये कहानी उनमे से किसी गौरव की नहीं है वरन हर गौरव की है , और अच्छे से कहूँ तो उस गौरव की है जो हम में से हर किसी के अंदर है | अपनी जाग्रत अवस्था में , क्षुप्त अवस्था में या विस्पोटक अवस्था में(Active State, Passive State & Explosive State) |
हम सब की तरह गौरव अपनी स्कूल का टॉपर ही था या शायद सेकंड रेंकर | बचपन से कुछ अलग करने की इच्छा , हर तथ्य को पीछे से देखना , हर सिक्के के दूसरे पहलु को जानने की उत्सुकता , दिनभर दिमाग में बिना काम की जोड़-बाकी करना; सबकुछ तो नोर्मल है ही एक आइआईटीयन(IITIAN) के लिए और अपेक्षा के अनुरूप वो बन भी गया | जब उसने इस हिचकोले खाती नाव में पैर रखा था तब उसने यह नहीं सोचा था की ज्वार बहार से नहीं उसके अंदर से ही उठेगा |
शुरू से पढाई में दम लगाया , पर अंदर ही अंदर कन्फ्युस था ; क्या ये पढाई है , क्या यही मुझे करना है | कभी उसका मन होता की इतना अमीर हो जाऊ की सारी जिंदगी केसिनो में निकाल दू , तो कभी उसकी इच्छा होती की बस अब राइट टाइम है मुझे ही इस देश को बदलना है | वैसे डायलोग (Dialog) मारने में तो वो काफी एक्सपर्ट था ही; कोई उससे पूछता “भाई गौरव तेरी लाइफ का ‘एम’ क्या है”| तो उसका जवाब होता “मेरी लाइफ का यही ‘एम’ है की बस मुझे कोई ‘एम’ मिल जाए”|
इन सब में कब तीन साल निकल गए पता नहीं चला| अंतिम वर्ष में आते-आते गौरव ने कुछ अपने मन के अनुसार चलना सीख ही लिया | अगर उसे गाँव में छोटे बच्चों के साथ अच्छा लगता तो वो अपनी सारी एनर्जी वन्ही झोंक देता, अगर वो किसी की बात से अग्री(agree) नहीं करता तो उससे तब तक दो-दो हाथ करता जब तक या तो वो ना हार मानले या खुद ही हार
जाए | उसकी तुनक मिजाजी उसकी arrogance , उसका व्यव्हार , उसकी तथ्यों के पीछे देखने की पुरानी आदत; ये सब उसका ‘स्व’ था | गौरव को उसे बदलना नहीं था वरन उसे ही सही दिशा देकर कुछ कर दिखाना था |
किन्तु एक मनुष्य के जीवन में transition phase एक-आध दिन का नहीं होता ये एक-दो सालो या उससे भी ज्यादा हो सकता है | अब जब गौरव लक्ष्य को उन्मुख हो चलने लगा , सोचने लगा तब तक Viscous Forces भी लगना शुरू हो गए थे | एक मध्यम परिवार का आज्ञाकारी संस्कारी बालक जो माता पिता के लिए अभी भी दस वर्ष का छोटा सा गौरव था | क्या कहेगा वो अपने अभिभावक से ? समझाना या तर्क तो दूर की बात वो अपने विचारों की अभिव्यक्ति कैसे करेगा | तब तक गौरव की एक मस्त सी नौकरी भी लग गयी ; यानि कॉलेज से निकलते ही सोचने के लिए मिलने वाला समय भी खत्म | इन सारे Viscous Forces ने उसकी सोच को, इच्छाशक्ति को दृढ अवश्य कर दिया | आज वो अपने मन की वल्गा खिचने की नहीं वरन ढीली छोड़ने की तैयारी में था | वह अपने वास्तविक स्वरूप को काफी कुछ समझ चुका था| उसने सोच लिया देश के लिए,इस समाज के लिए, और इसकी समस्याओ के निराकरण के लिए वो अपना जीवन लगा देगा |
इतना ही बड़ा ‘एम’ था उसका |
विषय था transition phase का , गौरव अपने जीवन के उलझे धागे सुलझाते-सुलझाते न जाने कब कॉलेज से उत्तीर्ण भी हो गया और नौकरी भी ज्वाइन कर ली |
पर अब उसके मन के स्वतन्त्र घोड़े उस एक टेबल की सीमा में कैसे रुक सकते थे | उसे तो पूरी दुनिया नापनी थी इन्टरनेट से नहीं अपने पेरो से , उसे तो हजारो लोगो को समझना था , उनके दर्द को जानना था . फेसबुक से नहीं उनके दिलो में झांक कर | रही बात माता-पिता की तो उसे अपने मन की खुश के लिए , अपनी आत्मा की शांति के लिए, अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए उसे उन्हें येनकेनप्रकारेण समझाना ही होगा | आखिर कल गौरव ने केवल दो महीने पच्चीस दिन की नौकरी के बाद मेनेजर को अपना (resignation latter) इस्तीफा दे ही दिया | आज गौरव का जन्मदिन है, आज वो पहले से कही ज्यादा शांतचित्त, प्रस्सन और आह्लादित है |
शायद ये मेरी अल्पबुधि की सीमा से बाहर है की में इस कहानी को आगे सोच सकू , या शायद इसकी जरुरत भी नहीं है | मेरी कहानी अपने ‘क्लाइमेक्स’ पर पहुच गई है | गौरव अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण सीढी चुका है ; वो अपनी सभी बंधन श्रंखलाए तोड़ चुका है |
क्या किया गौरव ने इसके बाद , पूरा हुआ उसके जीवन का ‘एम’ की, किन उचाइयों पर ले गया उसे उसका
 स्वतन्त्र मन | मेरे विचार में इन सब प्रश्नों के उत्तर हमे अपने भीतर ही तलाशने की जरुरत है ; साथ ही ह
मे आवश्यकता हे अपने ‘स्व’ को समझने की तथा अपनी उर्जा को निश्चित दिशा देने की | यह उदहारण हम सब लोगो के लिए है जिनके अंदर का ‘गौरव’ जाग्रत तो है किन्तु स्वर्ण श्रंखलाओ में बंधा हुआ है |
इति ||

"प्रणव "

1 comment: