एक स्वप्न सुनेहरा सजाएँ तो,
हम सब गर्वित रह पाएँ तो,
इसके लिए मान ले मेरी एक अर्ज़ी
उठा अपनी सोई खुदगर्ज़ी।
तू सबसे प्यार पायेगा
और जग में प्रेम लुटायेगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।
इस भागती हुई दुनिया में खुद को ढूंढ ला।
ज़रा रुक, ज़रा ठहर, ज़रा संभल जा।
एक बार पीछे मुड़कर देख तो सही ,
औरों के लिए तूने खुद को खो दिया कहीं।
तब भी हर कोई तुझसे मिलना चाहेगा
पर सबसे मिलकर तू खुद को पा जाएगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।
करेगा हर काम जब तू सही ढंग से ,
क्योंकि देख रहा होगा खुद को अपने ही मन से ,
उभर पायेगा तू दुनिया के मोह से ,
नहीं ललचायेंगे तेरेको कागज़ के टुकड़े।
तू रिश्वत की कमाई ठुकरयगा
और अपने आप से नज़रे मिला पायेगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।
कदर करेगा उसकी जो है तेरे पास ,
आम सी चीज़ भी तेरी होगी तेरे लिए खास।
लुफ़्त उठाएगा अपने साथ बिताये हर पल में,
निद्रा होगी गहरी तेरी कल में।
तुझको तेरी भाषा, संस्कृति और देश भायेगा ,
विश्व भ्रमण के बाद भी तू भारत लौट आएगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।
नहीं उतर पायेगा तू किसी के सीने में गोली ,
लहू बहाकर किसी का नहीं भर पायेगा अपनी झोली।
निकल पाएंगी अब वो भी घर से ,
जो अब तक थी चारदीवारी में सहमी हुई डर से
क्योंकि तू उन्हें सुरक्षित एहसास करवाएगा ,
पुरे विश्व में विश्वासपात्र बन जाएगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।
बात नहीं ये झूठे आत्म्सम्मानियों की ,
जिन्होंने इर्षा, अहं और लालच को आत्मसम्मान की आड़ दी
और जो स्वयं को शीर्ष पर रखने की खातिर
हो गए शीश काटने में माहिर।
ऐसा व्यक्ति तुझसे धुत्कार पायेगा ,
तू दूसरों की इज्ज़त का भी सम्मान कर पायेगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।
होगा सम्पूर्ण स्वप्न साकार तभी ,
जब मिलकर कदम उठायें सभी।
है मुश्किल पर नही नामुमकीन ,
और मुझे तुझ पर है पूरा यकीन
की इक दिन तू गर्व से रह पायेगा ,
मुड़कर इन दिनों को याद नहीं करना चाहेगा
जब तुझमे आत्मसम्मान जग जाएगा।