Friday, February 14, 2014

उर्मिला

"सुरदेवी के सुर-सागर से ,इक बुंदिया ले  मैं  आया हूँ। 
लघु-मुख से गुरु-गुण का झरना ,झरने का मन कर आया हूँ। "

दिव्य प्रेम कि अमर कहानी ,जाने किते हिरानी। 
त्याग मूर्ति उर्मिल की सुध से , अंखियन आवै पानी। 

पथ देखत पथराईं अँखियाँ ,निज प्रियतम के आवन की। 
नित-नित काहे परखे निष्ठुर ,बैरन बदरी सावन की।  
रैन-सहारा दीपक की लौ ,दिवस कटे रास्ता ताके। 
बचन-बद्ध नैना नहीं झरते ,लगे झरोखन में जा के। 
बादल कि ममता घिर आई ,प्रीत नई गहरानी।
रोई बदरिया चार पहरिया ,झर-जहर बरसे पानी। 

हाड़-माँस की बची पुतरिया प्राण गए दण्डक-वन में। 
कागा बैरी आस बंधावत ,उड़ि-उड़ि आवै आँगन में। 
प्रेम कभी स्वारथ न चाहे ,त्याग रूप सतकारी है। 
महज आकर्षण प्रेम नहीं है ,वह केवल लाचारी है। 
प्रेम-सिंधु बिंदु सम 'परमा ' ,नित-नित शीश झुकानी।  
त्याग मूर्ति उर्मिल की सुध से ,अंखियन आवै पानी। 

                                                                  -- परमानंद   

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