"सुरदेवी के सुर-सागर से ,इक बुंदिया ले मैं आया हूँ।
लघु-मुख से गुरु-गुण का झरना ,झरने का मन कर आया हूँ। "
दिव्य प्रेम कि अमर कहानी ,जाने किते हिरानी।
त्याग मूर्ति उर्मिल की सुध से , अंखियन आवै पानी।
पथ देखत पथराईं अँखियाँ ,निज प्रियतम के आवन की।
नित-नित काहे परखे निष्ठुर ,बैरन बदरी सावन की।
रैन-सहारा दीपक की लौ ,दिवस कटे रास्ता ताके।
बचन-बद्ध नैना नहीं झरते ,लगे झरोखन में जा के।
बादल कि ममता घिर आई ,प्रीत नई गहरानी।
रोई बदरिया चार पहरिया ,झर-जहर बरसे पानी।
हाड़-माँस की बची पुतरिया प्राण गए दण्डक-वन में।
कागा बैरी आस बंधावत ,उड़ि-उड़ि आवै आँगन में।
प्रेम कभी स्वारथ न चाहे ,त्याग रूप सतकारी है।
महज आकर्षण प्रेम नहीं है ,वह केवल लाचारी है।
प्रेम-सिंधु बिंदु सम 'परमा ' ,नित-नित शीश झुकानी।
त्याग मूर्ति उर्मिल की सुध से ,अंखियन आवै पानी।
-- परमानंद
लघु-मुख से गुरु-गुण का झरना ,झरने का मन कर आया हूँ। "
दिव्य प्रेम कि अमर कहानी ,जाने किते हिरानी।
त्याग मूर्ति उर्मिल की सुध से , अंखियन आवै पानी।
पथ देखत पथराईं अँखियाँ ,निज प्रियतम के आवन की।
नित-नित काहे परखे निष्ठुर ,बैरन बदरी सावन की।
रैन-सहारा दीपक की लौ ,दिवस कटे रास्ता ताके।
बचन-बद्ध नैना नहीं झरते ,लगे झरोखन में जा के।
बादल कि ममता घिर आई ,प्रीत नई गहरानी।
रोई बदरिया चार पहरिया ,झर-जहर बरसे पानी।
हाड़-माँस की बची पुतरिया प्राण गए दण्डक-वन में।
कागा बैरी आस बंधावत ,उड़ि-उड़ि आवै आँगन में।
प्रेम कभी स्वारथ न चाहे ,त्याग रूप सतकारी है।
महज आकर्षण प्रेम नहीं है ,वह केवल लाचारी है।
प्रेम-सिंधु बिंदु सम 'परमा ' ,नित-नित शीश झुकानी।
त्याग मूर्ति उर्मिल की सुध से ,अंखियन आवै पानी।
-- परमानंद
No comments:
Post a Comment