Friday, January 24, 2014

राष्ट्र की चेतना लिखूं ..!!!

                                                   -- संदीप शर्मा 

कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं 

लिखूं मनोभाव उस युवक का 
हृदय जिसका स्पंदन हीन शव सा 
रक्त नहीं पानी बहता है राग राग में 
उसकी मृत संवेदना लिखूं 
कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं 


लिखूं हाल उसका भी 
जो चिंता करता है
मगर सिर्फ चिंता करता है 
पहल और साहस का न मार्ग धरता है 
उसके भीतर की कोरी कल्पना लिखूं
कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं 


लिखूं उसके बारे में 
वीरता जिसका व्रत है
विजय जिसका प्रण है 
समर्पित जीवन का हर क्षण है 
उसकी सबको प्रेरणा लिखूं
कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं  

लगे तृण-तृण , कण-कण , हर जड़-चेतन 
हर क्षण नीड़  निर्माण में  
चाणक्य का ऐसा आह्वान लिखूं 
राणा और गुरु गोविन्द का बलिदान लिखूं 
परिभाषित करूं शिवाजी को दो शब्दों में 
तो अतुल्य साहस , अभेद्य योजना लिखूं 
कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं 


भले ही अरि दल नहीं समक्ष है
शत्रु नहीं प्रत्यक्ष है 
परोक्ष भी बलवान है 
मिटा दे सभ्यताओं को 
इतना सामर्थ्यवान होता है 
अब निर्वीर्यता स्वीकार्य नहीं 
मिले स्वर में स्वर हर युवक का 
ऐसी सामूहिक साधना लिखूं
कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं 


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