Wednesday, November 5, 2014

परिवर्तन

जैसा देस हो वैसा भेस हो
वैसी हो वहाँ की भाषा
ढल जाये जो तू भी उनमे
पूरी कर अपनी अभिलाषा

खेल होली तू उनके संग आज
रंग जा तू उन्ही  में
हार के खुद जीत ले उनको
इस विचारो की जंग में

जो ढल पाया है, बढ़ पाया है
अपने पथ पे आगे सदा
जो अड़ गया है, रह गया है
 अपनी जगह पे खड़ा

पर दूसरों के वास्ते
तू खो न देना खुद को कही
संभाल के रख खुद की खुद में
ये है तेरी ज़िंदगी।

Tuesday, February 18, 2014

" दृष्टीकोण "

ख्वाब देखती निफ्ट मंडली , करती अपना सर्वस्व समर्पित
अपनी पूरी तन्मयता से, ख्वाब सजाती करती अर्पित।
बस यही सोचती है वो हर पल ,कैसे लगे भविष्य की आँख में काजल
फैशन जगत का केंद्र बिंदु अपना कार्यस्थल
विश्व का सर्वोच्च स्थान है अपना कल।

बस एक दशक की सीमा लाँघ ,
 देता विश्व को ख्याति और प्रतिष्ठा की ललकार
मेरे दृष्टिकोण में मेरा निफ्ट
भारतीय संस्कृति की मारता हुंकार


 बड़ी अट्टालिकाओं और आधुनिकता का  जो न हो मोहताज  
 मेरे दृष्टिकोण में ,
 नयी नयी तकनीको का कर स्वागत ,
 निफ्ट बदलता अपना आज।



मेरे दृष्टिकोण में मेरा निफ्ट प्रांगण ,किये सुशोभित कई आभूषण
हरे वस्त्रो का ऐसा है आवरण , जिसे देख खुश होता पर्यावरण
जिसे देख हँसता पर्यावरण।
कुछ करने कि होड़ में जब ये मंडली जुटती एक बार ,
नयी तकनीक और नए विचारो का लगता अम्बार
जिसे देख नतमस्तक होता  संसार।

देश विदेश के दूर सुदूर  में बसी कला को
उन्नत करने का सपना देखा है ,
अपने इस दृष्टिकोण में मैंने
हर कलाकार को अपना बनते देखा है

हम महनत और लगन से एक ऐसा बाजार सजायेंगे
जहाँ मिटटी भी होगी मूल्यवान ,
जिसे देख सभी करे गुणगान
फैशन जगत में हम  अपना परचम लहराएंगे
 हम निफ्ट को खूब सजायेंगे , हम निफ्ट को खूब सजायेंगे।

-
जागेश्वर 

Friday, February 14, 2014

उर्मिला

"सुरदेवी के सुर-सागर से ,इक बुंदिया ले  मैं  आया हूँ। 
लघु-मुख से गुरु-गुण का झरना ,झरने का मन कर आया हूँ। "

दिव्य प्रेम कि अमर कहानी ,जाने किते हिरानी। 
त्याग मूर्ति उर्मिल की सुध से , अंखियन आवै पानी। 

पथ देखत पथराईं अँखियाँ ,निज प्रियतम के आवन की। 
नित-नित काहे परखे निष्ठुर ,बैरन बदरी सावन की।  
रैन-सहारा दीपक की लौ ,दिवस कटे रास्ता ताके। 
बचन-बद्ध नैना नहीं झरते ,लगे झरोखन में जा के। 
बादल कि ममता घिर आई ,प्रीत नई गहरानी।
रोई बदरिया चार पहरिया ,झर-जहर बरसे पानी। 

हाड़-माँस की बची पुतरिया प्राण गए दण्डक-वन में। 
कागा बैरी आस बंधावत ,उड़ि-उड़ि आवै आँगन में। 
प्रेम कभी स्वारथ न चाहे ,त्याग रूप सतकारी है। 
महज आकर्षण प्रेम नहीं है ,वह केवल लाचारी है। 
प्रेम-सिंधु बिंदु सम 'परमा ' ,नित-नित शीश झुकानी।  
त्याग मूर्ति उर्मिल की सुध से ,अंखियन आवै पानी। 

                                                                  -- परमानंद   

Friday, January 24, 2014

राष्ट्र की चेतना लिखूं ..!!!

                                                   -- संदीप शर्मा 

कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं 

लिखूं मनोभाव उस युवक का 
हृदय जिसका स्पंदन हीन शव सा 
रक्त नहीं पानी बहता है राग राग में 
उसकी मृत संवेदना लिखूं 
कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं 


लिखूं हाल उसका भी 
जो चिंता करता है
मगर सिर्फ चिंता करता है 
पहल और साहस का न मार्ग धरता है 
उसके भीतर की कोरी कल्पना लिखूं
कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं 


लिखूं उसके बारे में 
वीरता जिसका व्रत है
विजय जिसका प्रण है 
समर्पित जीवन का हर क्षण है 
उसकी सबको प्रेरणा लिखूं
कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं  

लगे तृण-तृण , कण-कण , हर जड़-चेतन 
हर क्षण नीड़  निर्माण में  
चाणक्य का ऐसा आह्वान लिखूं 
राणा और गुरु गोविन्द का बलिदान लिखूं 
परिभाषित करूं शिवाजी को दो शब्दों में 
तो अतुल्य साहस , अभेद्य योजना लिखूं 
कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं 


भले ही अरि दल नहीं समक्ष है
शत्रु नहीं प्रत्यक्ष है 
परोक्ष भी बलवान है 
मिटा दे सभ्यताओं को 
इतना सामर्थ्यवान होता है 
अब निर्वीर्यता स्वीकार्य नहीं 
मिले स्वर में स्वर हर युवक का 
ऐसी सामूहिक साधना लिखूं
कलम चले तो 
अंतर्मन की वेदना लिखूँ 
जड़ता की तरफ बढ़ते 
राष्ट्र की चेतना लिखूं