Thursday, July 25, 2013

अजातशत्रु


शीर्षक-          अजातशत्रु 
छंद-              सरसी 
छंद संरचना -  १६,११ 
                    १६,११ अंत में गुरु-लघु (sl) 
                    

मैं मृदुवाचक बना हुआ था ,अंत: कपट समाय |
अजातशत्रु मैं खुद को समझू ,छाती दंभ छिपाय |
श्याम सखा अन्दर  से बोला , काहे फूला जाय |
क्रोध,मोह,आलस्य,दंभ-से,रिपु को भूला जाय ||1||


अजातशत्रु तू तभी बने जब ,क्रोध क्षमा बन जाय |
नादानी के अपराध सहे ,खड़ा-खड़ा मुस्काय |
अजातशत्रु तू तभी बनेगा ,मोह बने जब त्याग |
वंचित को अपने हिस्से से ,सौंपेगा कुछ भाग ||2||


अजातशत्रु तू तभी बने जब ,आलस हो असहाय |
किस्मत के अभिलेख भूलकर ,कर्म ध्वजा फहराय |
मधुसूदन का कर्म-संदेसा ,जन-जन तक पहुचाय |
वही निर्भय हो भाग्य रेख से ,रिपु-विहीन कहलाय ||3||

'दंभ नहीं ' - इस दंभ में  खोय , दंभ करे तू घोर |
प्रेम  घटा ना  घिर-घिर आवै ,कैसे नाचे मोर |
दंभ-अरि जब विनय मीत बने ,प्रेम किवरिया खोल |
अजातशत्रु 'परमा' तू होगा ,श्री हरि माधव बोल ||4||

                                                       --parmanand

Monday, July 22, 2013

ताटंक-छंद

ओ   मनवा !  रिश्तेदारों  से ,दूर  रहें तो  प्यारे  हैं |
साथ  गुंथने  से  दुःख  बढ़े ,अपने  भी कुप्यारे हैं |
प्यार दुलार सबै नौटंकी ,मेल-मिलाप छलावा है |
ये स्वारथ की सब झांकी है ,या मन का बहलावा है |

कुण्डलिया

या माया  का   जाल  है   ,करे    चुटीले     घात |

'परमा' तुम मूरख भये ,फिर फिर फसने जात |

फिर फिर फसने जात ,  मोह के फांस निराले |

करे   किसी   से   दूर , किसी  को गले लगा ले |

देख  मान   सनमान , तु  फूला  नहीं   समाया |

आँख सुबुधि की खोल , तज दे  मोह  या माया |